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Posts Tagged ‘कहानी’

अभी कुछ ही दिन पहले रमेश की नौकरी एक बड़े  कंपनी मे लगी थी | उसके सपने साकार होने वाले थे.| जिंदगी की जद्दोजहद ने उससे उम्र से जल्दी बुध कर दिया था | पिता को गुजरे अरसा बीत गया था घर मे अकेली माँ और एक छोटी बेहें थी| जिसके लालन पालन, पढाई लिखी शादी ब्याह की जिम्मेवारी भी रमेश की कन्धों पे आ पड़ी थी | उसके पिता रजिस्ट्री ऑफिस मे मुलाजिम थे| कम आमदनी मे घर का निपटा जैसे तैसे होता था| पर रमेश को पढ़ाना जैस उनकी जिद्द थी| रमेश शुरू से ही कुशाग्र था हरेक क्लास मे पहले दुसरे स्थान पे रहता | इससे उसके पिता की उम्मीद भी बढ़ गयी थी  चलो गरीब घर से एक तो चिराग निकलेगा | पर रमेश के दशवी के इम्तिहान के दौरान उसके पिता की अकस्मात मृत्यु हो गयी | रमेशइस घटना से अन्दर से हिल गया था |उससे सूझ नहीं रहा था की आगे घर का पालन पोषण कैसे चलेगा | रिश्तेदारों से भी उम्मीद करना भी बेकार था| जो पिता के जीते नहीं मदद कर पाए तो अब उनके ना रहने से कौन ही आता |जैसे तैसे उसने सुबह सुबह अखबार बेचने का काम शुरू किया , दिन मे वो सरकारी दफ्तर मे चाय बेचता | इस साल उसकी दशवी की परीक्षा जाती रही| पर उसकी माँ को ये गवारा न था की जिस उम्मीद से उसके पिता ने रमेश को पढ़ने की जिद्द ठानी थी वो जिंदगी की आपा धापी मे कहीं बेकार न हो जाए| माँ के सलाह पे रमेश ने शाम की कक्षा  मे दाखिला ले लिया | रोज़ के रोज़ वो दिन भर काम मे व्यस्त रहता और शाम मे पढाई करता| रमेश की माँ अपने कालोनी की कुछ औरतों को मिल कर सिलाई कधी का काम करने लगी| घर मे पैसे का अभाव तो था ही, पर दोनों का गुजर बसर थीम ठाक से हो जाता| इस तंगी ने रमेश को जिंदगी का सबसे बड़ा सबक दिया…कम खर्च और सदुपयोग  का| हम्मे से कितने लोग हैं जो अपनी कमी का एक चौथाई हिस्सा होटलों मे एक ही रात मे खर्च कर देते हैं, खाना नहीं पसंद आया तो यूँ ही छोड़ दिया… कभी सोचा है उनकी व्यथा जिन्हें एक वक़्त की रोटी नसीब नहीं होती| जूठन से पेट भरते हैं कई तो| रमेश की माँ ने उसे अछे संस्कार दिए| गरीबी और अ-संस्कार मे कोई तालमेल नहीं है| लोग गरीबी मे भी अपने बच्चों को वो संस्कार सीखा जाते हैं जो आमिर अपने पूत को कभी नहीं दे पाते|

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भाग एक

चित्र द्वारा geneha.com

राधेश्याम जी  के लिए आज का दिन बहुत ही महत्वपूर्ण था, आज उनका बेटा आई ऐ एस ऑफिसर बन के घर को आ रहा था | काश वो भी बेटे के पासिंग परेड मे जा सकते | अहंकार मनुज के बुध्दी का नाश कर देती है, पर ये अहंकार न था | ये तो कुछ और ही था |
बचपन से श्याम को उन्होंने अपना स्नेह प्रकट नहीं किया| अन्दर से पिता का प्यार हमेशा उम्दा पर कहीं ना कहीं कठोरता हावी रही|
श्याम कहाँ है, राधेश्याम जी  ने अपनी धर्म पत्नी, रमा से पूछा| देखो यहीं कहीं होगा शाम के ७ बजे कहाँ गया होगा |  तुमने अपने लाड प्यार से बिगाड़ के रख है उससे   कभी पूछ है स्कूल मे क्या करता है कैसी पढाई चल रही है.| अच्छा जैस मैंने अकेले ही श्याम को जन्म दिया है … तुम उसके पिता हो तुम नहीं पूछ सकते….क्या पूछोगे … कभी काम से फुर्सत मिले तब तो… जब देखो ऑफिस ऑफिस ऑफिस… अब तो घर मे भी खोल लो अपना दफ्तर…. हम तो तुम्हारे है ही कौन?… बस बस हो गया ताने मत मारा करो.. किसके लिए करता हूँ ये सब …|  माना हमारे लिए करते हो… श्याम के भविष्य के लिए करते हो … पर इसका क्या मतलब ऑफिस मे लगे रहोगे… ऑफिस के बाहर भी कोई दुनिया है या नहीं…तुम भी पूछ सकते हो… की कैसी पढाई चल रही है? आने दो आज… मे लेता हूँ खबर | लो हो गए शुरू फिर तुम… बच्चे को मार पित के नहीं प्यार दुलार से समझाया करो…|
भाई आज तो शामत है… रमेश ने धीमी आवाज़ मे कहा, आज सभी टीचर हमारी बेज्जती करेंगे माँ बाप के सामने… ओहो और फिर घर मे टेंशन वो अलग…श्याम चुपचाप इन सबों की बाटेंग सुन रहा था | एक तरह से अच्छा ही हैं मेरे घर से कोई नहीं आ रहा कम से कम इन सब लफड़ों से तो बचा हूँ| तभी रमेश ने श्याम को टोकते हुए कहा… श्याम, आज तो पेरेंट्स-टीचर मीटिंग है ना … तुम्हारे घर से कौन आ रहा है | कोई नहीं…| मतलब | कोई नहीं मतलब कोई नहीं| ये कह श्याम चलता बना|
आज तो स्कूल मे मीटिंग थी ना, बताया क्यूँ नहीं … जैसे बताने से आप चले ही जाते….slap … slap… ऐसे बात करते हैं पिता जी से….रोना धोना बंद करो … और आइंदे से जब भी कोई मीटिंग हो मुझे बताया करो| श्याम रोता हुआ चेहरा ले अपने कमरे मे चला गया| ऐसे भी कोई मारता है अपने बच्चे को… प्यार से भी बोल सकते थे| रमा तुम इसमें अपनी टांग मत अडाओ, तुम ही कहती हो बच्चे पे नज़र रखो कहीं बिगड़ ना जाए  और अब तुम ही….| मैंने कहा प्यार से भी….| रहने दो मेरा आज बेहेस करने का मूड नहीं …. ये कह कर राधेश्याम जी अपने स्टडी रूम को चल दिए…| रमा श्याम के कमरे के पास खड़ी देखती रही…उससे रहा नहीं गया… |         बेटा क्यूँ नहीं बताते तुम पापा को | क्या बताना माँ, सभी के पापा आते हैं बस मेरे ही पापा … श्याम रो पड़ा| पापा को बताते तो वो टाइम निकाल के जरूर आते| रहने दो माँ … तुम्ही बताओ… आखिरी बार जब स्कूल मे वार्षिक समारोह था , जब मुझे मेडल मिलने वाला था … तब तो बताया था न पापा को… आये क्या? उस समय तुम्हारे पापा को कोई जरूरी काम थे बेटा…हाँ माँ पाता है कितना जरूरी काम था… खैर रहने दो… कह देना अगली मीटिंग के बारे बता दूंगा…
राधेश्याम कुछ समझ नहीं पा रहा था, कैसे श्याम ऐसा हो गया
आपकी समझ से, किसकी गलती है और कहाँ?

 

 

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